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शनिवार, 31 मई 2014

गोस्वामी लक्ष्मीनाथ परमहंस की (संक्षिप्त जीवनी)

अखण्ड मंडलाकरं व्याप्तं येन चराचरम्
तत्पदं दर्शितं येन तस्मैं श्री गुरुवे नमः।।१।।

रविः वाह्य तमो हन्ति चान्तध्र्वान्तं महागुरुः
तस्माल्लक्ष्मीपतिं वन्दे हृदयस्थ दिवाकरम् ।।२।।

प्रातःस्मरणीय गोस्वामी लक्ष्मीनाथ परमहंस का जन्म जिला सुपौल के परसरमा गाँव में विक्रम संवत् 1850 (1793 ईo सन 1200 साल) में हुआ था।

आपके पिता का नाम पंडित बच्चा झा था।  आप कुजीलवार दिगौन मूल और कात्यायन गोत्र के मैथिल ब्राह्मण थे। बचपन में आप कुछ समय तक श्री कृष्ण की तरह गौ सेवा में रहे।  पीछे उपनयन संस्कार संस्कार से संस्कृत हो, महिनाथपुर के ज्योतिषी पंडित श्री रत्ते झा के पास ज्योतिषी शास्त्र अध्ययन करने के लिए गए। कुछ समय तक आपने अध्ययन किया।

पंडित रत्ते झा तंत्र शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता ही नहीं, सफल साधक भी थे। आपकी उत्कट अभिलाषा देख, पंडित जी ने तंत्र शास्त्र की शिक्षा एवं साधना पर अग्रसर होने में काफी सहायता पहुँचायी। आपने गुरु की कृपा से, कुछ कालों में ही अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। गुरु के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा लगाए गए अभियोग में आपने तंत्रबल से गुरु को मुक्त कर, तंत्र परीक्षोत्तीर्ण हुए।  शव - साधना से गुरु भाई को भी उत्तीर्ण कराये।  अध्ययन समाप्त कर, गुरु को दक्षिणा दे,  उनसे अमोध आशीर्वाद लेकर लौट आये।

आपके माता - पिता को आपके चेहरे पर एक अजीब उदासीनता की छाप मालूम पड़ी। उदासीनता को मिटाने के लिए उन लोगो ने आपका विवाह कर देना अच्छा उपाय सोचा। यद्यपि आप विवाह करना नहीं चाहते थे।  विवाह को आप भावी साधना के लिए प्रबल बाधा समझते थे। किन्तु भावी शुभ संकल्पित मार्ग में माता - पिता की आज्ञा का उल्लंघन भी तो धर्म विरोधी विकट विघ्न था।  आप इस प्रकार के मानसिक द्वन्द में कुछ काल तक किंकर्तव्यमूढ़ रहे। अंत में धर्म की ही विजय हुई। माता - पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर आपने कहुआ ग्राम के शोखादत्त ठाकुर की सौभाग्यवती कन्या का पानी - ग्रहण किया। गृहस्थी में आपका मन नहीं लगा। बचपन से ही आपको योगाभ्यास करने की प्रबल इच्छा थी। किन्तु योग्य गुरु नहीं मिलने के कारण आप उनकी खोज में निकल पड़े।

जंगल में भटकते हुए सौभाग्य से योगिराज लम्बानाथ जी से आपकी मुलाकात हो गई।

आपकी प्रबल आकांक्षा एवं पात्र शिष्यत्व की योग्यता देख योगिराज श्री लम्बानाथ ने आपसे पूछा :- तुम्हारा क्या उद्देश्य हैं ?

आप - मैं एक योग निष्णात गुरु की खोज में निकला था।  ईश्वर ने दया करके उनसे मिला दिया।

साधू - योग से क्या काम ?

आप - बचपन से ही मुझे योग सिखने की प्रबल इच्छा हैं।  इसलिए मैं योगी गुरु चाहता हूँ।

साधू - कलियुग में योगाभ्यास कठिन प्रयास हैं।  इस युग में भगवत कीर्तन ही मुख्य विषय हैं।  "कलौ केवल कीर्तनम् कीर्तनीयो सद हरिः।।"

आप - यह बात सही हैं। किन्तु, "योगाभ्यास कठिन हैं," इसे मैं ह्रदय में स्थान देना चाहता।  इससे पुरुषार्थ का अपमान होता हैं।

साधू - मेरी सलाह सुनो तो योग को छोड़ भक्ति की ही शरण लो।

आप - भक्ति तो सेवनीय है ही किन्तु मेरा विश्वास है कि श्रीमान जैसे उदार गुरु यदि इस दीन योगजिज्ञासु को अपना लें तो योगाभ्यास कठिन नहीं, सरलतम हो जायेगा।

साधू - देखो यह गहन वन हैं, यहाँ खाने - पीने का कोई प्रबन्ध नहीं हैं।  तुम अन्न भोगी जीव हो।  विश्राम का ठिकाना नहीं। हिंसक जन्तुओं से जंगल भरा पड़ा हैं। यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं। अपने ही देश जाकर किसी योगी से शिक्षा लेकर अभ्यास करना।

आप - अब देश में योगी कहाँ पावें ? अगर वहाँ योगी मिलते तो इस प्रकार पर्वत और जंगल की ख़ाक क्यों छानते ?

साधू - तुम्हारा घर किस देश में हैं ?

आप - मिथिला में।

आश्चर्य चकित होकर साधू ने कहा :- "क्या तुम मिथिलावासी हो ? वहाँ अब योगी नहीं मिलते ? याज्ञवल्क्य के
जन्मभूमि की यह हालत ? जहाँ से संसार अध्यात्म विद्या की शिक्षा लेता था, जहाँ के राजा भी महायोगी होते थे, वहाँ अब योगी का मिलना दुर्लभ ?" "कालोहि दुरती क्रमः" युवक क्या यह सच कह रहे हो ?

आप - गुरुदेव ! मैं सच कह रहा हूँ।  एक-दो कहीं छिपे हों तो नहीं कह सकते मगर प्रगट रूप में तो उनका सर्वथा अभाव ही हैं। साधू कुछ समय तक किंकर्तव्यविमूढ़ रहे और अन्त में बोले "वत्स ! मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ।"

साधू ने पूछा  - "युवक तुम्हारा नाम ?"

आप ने उत्तर दिया - "लक्ष्मीनाथ झा"

साधू - "झा" शब्द का क्या अर्थ ?

आप - हमलोग, उपाध्याय वंश के हैं।  उपाध्याय का अपभ्रंश "ओझा" और ओझा का अपभ्रंश "झा" रह गया हैं। साधू ने मुस्कुराते हुए कहा - ज्यों - ज्यों विद्या घटती गई होगी त्यों - त्यों उपाधि भी घटती गई।  न जाने यह झा कहाँ विश्राम लेगा।  फिर आपकी ओर मुड़कर बोले - युवक ! मदन उपाध्याय को जानते हो ?

आप - वे सदगति प्राप्त कर चुके हैं। उनके नाम और यश से परिचित हूँ।

साधू - वे अच्छे तांत्रिक और "भैया" के भक्त थे।  यह कह कर साधू नित्य कर्म करने चले गये।

आप प्रसन्न होकर आश्रम में रहने लगे।  एक दो बार गुरु की अनुमति से कन्दरा के भीतर भी गये किन्तु कोई विशेषता नहीं पायी। हर बार आपने दो साधुओं को समाधिस्थ पाया।  कन्दरा के अन्तर्गत दो समाधिस्थों में प्रथम अतिवृद्ध गुरु गोरख नाथ तथा दूसरे वृद्ध उनके शिष्य थे।  साधू (लम्बानाथ) गोरख नाथ के शिष्य के शिष्य थे।

आरम्भ में साधू सही लम्बानाथ  ने आपको योग साधना की प्राथमिक क्रियाये बतलायी।  फिर शरीर शुद्धि, अंगन्यास मुद्राये, आसन और प्राणायाम के भेद तथा उनके साधन के नियम बतलाये। तदन्तर अष्टांग योग की शिक्षा देकर उनकी सिद्धि करने की बिधि बतलाई।  इसके बाद समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद आदि चतुष्पदों का ज्ञान कराकर उनके साधनाओ के नियम बतलाये।  इस प्रकार योगिराज श्री लम्बानाथ ने छः महीनों में ही योग के सभी आवश्यक विषयों का ज्ञान कराया और उनके साधनों में सफलता भी दिलाई। फिर गुरु ने स्वदेश लौट जाने एवं भगवत भजन की आज्ञा दी।  योग स्नातक आपने पत्र, पुष्प, फल  और जल दक्षिणा में देकर योग विद्या का समावर्तन किया एवं गुरु से आशीष प्राप्त किया।  निःस्वार्थ, निर्लोभ, विरक्त एवं दयालु गुर ने दक्षिणा स्वीकार कर प्रेम प्लावित ह्रदय से आपको आशीर्वाद दिया और शीर्षाध्राण किया। इस प्रकार योग बल से ३५ कला के पूर्ण ही गुरु जी ने आपको अभीष्ट स्थान (दरभंगा) भेज दिया।

आप घर से अन्यत्र रहुआ गाँव के एक पीपल वृक्ष के निचे अपना साधना स्थान चुना। वर्षों की कठिन तपस्या से अभिलाषित दक्षता प्राप्त कर परिब्राजक के रूप में प्रसिद्ध-प्रसिद्ध स्थानों में घूमने लगे। राजा - महाराजाओं के यहाँ से बुलाहटे आने लगी किन्तु आप कहीं जाना पसन्द नहीं करते थे। जिनका विशेष आग्रह और प्रेम देखते थे, आप वहाँ जाते भी थे।

बनगाँव के और्जस्वल (पहलवानी) युग में परिब्राजक आप यहाँ पधारे। उस समय आप संन्यास ग्रहण कर शिखा सूत्र को तिलांजलि दे चुके थे। आपका ऊर्जस्वी तथा गठित स्वास्थ्य देखकर क्या युवा क्या वृद्ध सबों ने हर्ष पूर्वक बनगाँव में आपका स्वागत किया। स्वागत इसलिए नहीं की आप महान साधू या योगी थे अपितु उन लोगों का विश्वास था कि अगर आपको अच्छी तरह से खिलाया - पिलाया गया तो आप एक अच्छे पहलवान निकलेंगे।  आप भी अपने गुणों को प्रगट नहीं करना चाहते थे।  आप ग्रामवासियों के साथ घुल - मिल गये। चिक्कादरबर (कबड्डी), खोरि चिक्का, छूर-छूर आदि देहाती खेलों में आप अच्छे खिलाड़ी समझे जाते थे।

उस समय बनगाँव में दूध - दही का बाहुल्य था। एक धनी-मानी सज्जन (श्री कारी खाँ) ने आपको दूध पिने के लिये एक अच्छी दूध देने वाली गाय दे दी थी। गाय को खिलाने - पिलाने का भार आप पर नहीं था।

आपके लिये ग्रामीणो ने ठाकुरवाड़ी के प्रांगन में एक पूर्ण कुटी बनबा दी थी।  अधिक से अधिक समय आप बनगाँव में ही रहते थे। इसलिये नहीं नहीं कि आप खेल और पहलवानी को अधिक पसंद करते थे, बल्कि इसलिये की यहाँ के लोग बहुत सीधे - साधे और साधु - महात्माओं को बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। दिन भर आप उनलोगों के साथ रहते थे और रात में योगाभ्यास किया करते थे।

बनगाँव में ही आपको "विभूतिपाद" की रश्मि विकसित हुई। अनुमानतः 1819 ईo से आपने ब्रजभाषा और मैथिली में कविता लिखना प्रारम्भ किया।  अधिकतर आप दोहा, चौपाई, और गीत लिखा करते थे।  आपके समकालीन कवि श्री छत्रनाथ झा, मिस्टर जॉन, और रामरूप दास थे। एक बार कवि छत्रनाथ झा जी ने आप की कविता में मात्रा दोष पर अपनी अभिव्यक्ति दी। आपने आशय समझ कर प्रत्युत्तर में कहा - "इसका परिणाम यही कि मेरा अनिष्ट होगा। मैं एक संन्यासी हूँ, संन्यासी को वंश से क्या प्रयोजन, उसे तो भगवत भक्ति चाहिये।

आपने अपने जगहों में भगवान के मंदिर के साथ - साथ अपनी कुटिया भी स्थापित की। जिसमे बनगाँव,
परसरमा, फैटिकी, लखनौर एवं शक्रपुरा आदि स्थानों की कुटियाँ अधिक प्रसिद्ध हैं। जमीन्दारी समाप्ति के पूर्व तक, इस कुटियों का भरण - पोषण शक्रपुरा राज्य से हुवा। आपने अनेक स्थानों में पोखरों, कुओं, और फुलवारियों की भी सृष्टि की।

लोग आपकी अद्दभुद योग शक्ति का प्रभाव देख कर आपको योगी विशेष का अवतार समझने लगे।  रोगियों और बन्ध्याओं का ताँता बन्धने लगा।  लोग आपकी अमोध वाणी से लाभ उठाने लगे। आप यथासाध्य सबका दुःख दूर किया करते थे।


प्रेम से बोलिये "श्री श्री १०८, श्री बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई" की जय

वेबसाइट : व्यवस्थापक के दो शब्द

समस्त बनगाँव, संग समस्त मिथिला वासी कs हमर सादर प्रणाम।

हम जितमोहन झा, आय समस्त मिथिलांचल वासी के बीच परमहंस लक्ष्मीनाथ गोस्वामी जी के सम्पूर्ण जीवनी, आर हुनकर रचित ग्रन्थ गीतावली के इ-प्रकाशन लेल उपस्थित छी।

हम निक जोका बुझैत छी, गोस्वामी जीक जीवनी आर हुनकर ग्रन्थ कs इ-प्रकाशित करब बहुत कठिन काज अछि।  मुदा हमरा विश्वास अछि, यदि बाबा के कृपा भेल तें हम एहि मs जरूर सफल होयब।

गीतावली कs इंटरनेट पर प्रकाशित करबाक इच्छा ओना तें हमरा बहुत पहिने सs छले, मुदा किछ दिन पहिने हमरा "परमहंस लक्ष्मीनाथ गोस्वामी समिति - जमशेदपुर" द्वारा सन 1969  ईo मs  प्रकाशित, परमहंस लक्ष्मीनाथ  रचित ग्रन्थ "गीतावली" हाथ लागल। जे पूर्ण रुपे फाटल अवस्था मs अछि। हम ओकरा पढ़बाक प्रयाश के रहल छी।  बस अपने सभक आशीर्वाद चाही, ताकि हम इ कठिन काज कs पूरा के सकी।

बनगाँव ऑनलाइन वेबसाइट बनेबाक पाछा हमर उद्देश्य सब बनगाँव वासी कs इंटरनेट के माध्यम सs एक - दोसर संग जोरबाक अछि। हमर इच्छा अछि, बनगाँव ऑनलाइन एक निक समाचार पोटर्ल बने।  ताकि गाम सs दूर रहैय बला हर बनगाँव वासी तक गाम के सभ समाचार पहुँचैत रहे।

चुकी हम खुद एखन गाम सs दूर मुंबई रही रहल छी, तें हमर इ प्रयाश एखन तुरंत संभव नै बुझा रहल अछि।  हाँ, जहिया हम गाम मs रहे लागब तहिया एकरा पूरा करबाक प्रयाश करब। ताधरि आऊ सभ मिल बाबा लक्ष्मीनाथक गुणगान करी।

प्रेम सँ कहु जय बाबाजी 


नोट : बाबा के भक्त सभ भाषा - भाषी के लोक छैन्ह, ताहि लेल हुनकर जीवनी आर  विशिष्ट चमत्कार हम हिंदी मs लिखब।

संगे "परमहंस लक्ष्मीनाथ गोस्वामी समिति - जमशेदपुर" द्वारा सन 1969 ईo मs प्रकाशित (गीतावली) के टैपिंग आर प्रिंटिंग मs बहुत रास अशुद्धि देखल गेल। जकरा मs हम कुनु परिवर्तन करब उचित नै बुझैत छी। एहि लेल क्षमा चाहब।

धन्यवाद। 

विद्यापति गीत - अभिनव कोमल सुन्दर पात

अभिनव कोमल सुन्दर पात !
सगर कानन पहिरल पट रात !१!

मलय-पवन डोलय बहु भांति !
अपन कुसुम रसे अपनहि माति !२!

देखि-देखि माधव मन हुलसंत !
बिरिन्दावन भेल बेकत बसंत !३!

कोकिल बोलाम साहर भार !
मदन पाओल जग नव अधिकार !४!

पाइक मधुकर कर मधु पान !
भमि-भमि जोहय मानिनि-मान !५!

दिसि-दिसि से भमि विपिन निहारि !
रास बुझावय मुदित मुरारि !६!

भनइ विद्यापति ई रस गाव !
राधा-माधव अभिनव भाव !७!

विद्यापति गीत - अभिनव पल्लव बइसंक देल

अभिनव पल्लव बइसंक देल !
धवल कमल फुल पुरहर भेल !१!

करु मकरंद मन्दाकिनि पानि !
अरुन असोग दीप दहु आनि !२!

माह हे आजि दिवस पुनमन्त !
करिअ चुमाओन राय बसन्त !३!

संपुन सुधानिधि दधि भल भेल !
भगि-भगि भंगर हंकराय गेल !४!

केसु कुसुम सिन्दुर सम भास !
केतकि धुलि बिथरहु पटबास !५!

भनइ विद्यापति कवि कंठहार !
रस बझ सिवसिंह सिव अवतार !६!

विद्यापति गीत - अम्बर बदन झपाबह गोरि

अम्बर बदन झपाबह गोरि !
राज सुनइ छिअ चांदक चोरि !१!

घरे घरे पहरु गेल अछ जोहि !
अब ही दूखन लागत तोहि !२!

कतय नुकायब चांदक चोरि !
जतहि नुकायब ततहि उजोरि !३!

हास सुधारस न कर उजोर !
बनिक धनिक धन बोलब मोर !४!

अधर समीप दसन कर जोति !
सिंदुर सीम बैसाउलि मोति !५!

भनइ विद्यापति होहु निसंक !
चांदुह कां किछु लागु कलंक !६!

विद्यापति गीत - आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन

आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन, बदन मलिन भेल तारो !
मन्द वचन तोहि कओन कहल अछि, से न कहिअ किअ मारो !१!

आजुक रयनि सखि कठि बितल अछि, कान्ह रभस कर मंदा !
गुण अवगुण पहु एकओ न बुझलनि, राहु गरासल चंदा !२!

अधर सुखायल केस असझासल, धामे तिलक बहि गेला !
बारि विलासिनि केलि न जानथि, भाल अकण उड़ि गेला !३!

भनइ विद्यापति सुनु बर यौवति, ताहि कहब किअ बाधे !
जे किछु पहुँ देल आंचर बान्हि लेल, सखि सभ कर उपहासे !४!

विद्यापति गीत - आसक लता लगाओल सजनी

आसक लता लगाओल सजनी, नयनक नीर पटाय !
से फल आब परिनत भेल मजनी, आँचर तर न समाय !१!

कांच सांच पहु देखि गेल सजनी, तसु मन भेल कुह भान !
दिन-दिन फल परिनत भेल सजनी, अहुनख कर न गेआन !२!

सबहक पहु परदेस बसु सजनी, आयल सुमिरि सिनेह !
हमर एहन पति निरदय सजनी, नहि मन बाढय नहे !३!

भनइ विद्यापति गाओल सजनी, उचित आओत गुन साइ !
उठि बधाव करु मन भरि सजनी, अब आओत घर नाह !४!

विद्यापति गीत - आहे सखि आहे सखि लय जनि जाह

आहे सखि आहे सखि लय जनि जाह !
हम अति बालिक आकुल नाह !१!

गोट-गोट सखि सब गेलि बहराय !
ब केबाड पहु देलन्हि लगाय !२!

ताहि अवसर कर धयलनि कंत !
चीर सम्हारइत जिब भेल अंत !३!

नहि नहि करिअ नयन ढर नीर !
कांच कमल भमरा झिकझोर !४!

जइसे डगमग नलिनिक नीर !
तइसे डगमग धनिक सरीर !५!

भन विद्यापति सुनु कविराज !
आगि जारि पुनि आमिक लाज !६!

विद्यापति गीत - उचित बसए मोर मनमथ चोर

उचित बसए मोर मनमथ चोर !
चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर !१!

बारह बरख अवधि कए गेल !
चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल !२!

बास चाहैत होअ पथिकहु लाज !
सासु ननन्द नहि अछए समाज !३!

सात पाँच घर तन्हि सजि देल !
पिआ देसाँतर आँतर भेल !४!

पड़ेओस वास जोएनसत भेल !
थाने थाने अवयव सबे गेल !५!

नुकाबिअ तिमिरक सान्धि !
पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि !६!

मोरा मन हे खनहि खन भाग !
गमन गोपब कत मनमथ जाग !७!

विद्यापति गीत - कंटक माझ कुसुम परगास

कंटक माझ कुसुम परगास !
भमर बिकल नहि पाबय पास !१!

भमरा भेल कुरय सब ठाम !
तोहि बिनु मालति नहिं बिसराम !२!

रसमति मालति पुनु पुनु देखि !
पिबय चाह मधु जीव उपेंखि !३!

ओ मधुजीवि तोहें मधुरासि !
सांधि धरसि मधु मने न लजासि !४!

अपने मने धनि बुझ अबगाही !
तोहर दूषन बध लागत काहि !५!

भनहि विद्यापति तओं पए जीव !
अधर सुधारस जओं परपीब !६!

विद्यापति गीत - कान्ह हेरल छल मन बड़ साध

कान्ह हेरल छल मन बड़ साध !
कान्ह हेरइत भेलएत परमाद !१!

तबधरि अबुधि सुगुधि हो नारि !
कि कहि कि सुनि किछु बुझय न पारि !२!

साओन घन सभ झर दु नयान !
अविरल धक-धक करय परान !३!

की लागि सजनी दरसन भेल !
रभसें अपन जिब पर हाथ देल !४!

न जानिअ किए करु मोहन चारे !
हेरइत जिब हरि लय गेल मारे !५!

एत सब आदर गेल दरसाय !
जत बिसरिअ तत बिसरि न जाय !६!

विद्यापति कह सुनु बर नारि !
धैरज धरु चित मिलब मुरारि !७!

विद्यापति गीत - कि कहब हे सखि रातुक बात

कि कहब हे सखि रातुक बात !
मानक पइल कुबानिक हाथ !१!

काच कंचन नहि जानय मूल !
गुंजा रतन करय समतूल !२!

जे किछु कभु नहि कला रस जान !
नीर खीर दुहु करय समान !३!

तन्हि सएँ कइसन पिरिति रसाल !
बानर-कंठ कि सोतिय माल !४!

भनइ विद्यापति एह रस जान !
बानर-मुह कि सोभय पान !५!

विद्यापति गीत - कुंज भवन सएँ निकसलि रे

कुंज भवन सएँ निकसलि रे रोकल गिरिधारी !
एकहि नगर बसु माधव हे जनि करु बटमारी !१!

छोड कान्ह मोर आंचर रे फाटत नब सारी !
अपजस होएत जगत भरि हे जानि करिअ उधारी !२!

संगक सखि अगुआइलि रे हम एकसरि नारी !
दामिनि आय तुलायति हे एक राति अन्हारी !३!

भनहि विद्यापति गाओल रे सुनु गुनमति नारी !
हरिक संग कछु डर नहि हे तोंहे परम गमारी !४!

विद्यापति गीत - कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल

कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल !
चरन-चपल गति लोचन लेल !१!

अब सब अन रह आँचर हाथ !
लाजे सखीजन न पूछय बात !२!

कि कहब माधव वयसक संधि !
हेरइत मानसिज मन रहु बंधि !३!

तइअओ काम हृदय अनुपाम !
रोपल कलस ऊँच कम ठाम !४!

सुनइत रस-कथा थापय चीत !
जइसे कुरंगिनि सुय संगीत !५!

सैसव जीवन उपजल बाद !
केओ नहि मानय जय अवसाद !६!

विद्यापति कौतुक बलिहारि !
सैसव से तनु छोडनहि पारि !७!

शुक्रवार, 30 मई 2014

विद्यापति गीत - के पतिआ लय जायत रे

के पतिआ लय जायत रे, मोरा पिअतम पास !
हिय नहि सहय असह दुखरे, भेल माओन मास !१!

एकसरि भवन पिआ बिनु रे, मोहि रहलो न जाय !
सखि अनकर दुख दारुन रे, जग के पतिआय !२!

मोर मन हरि लय गेल रे, अपनो मन गेल !
गोकुल तेजि मधुपुर बसु रे, कत अपजस लेल !३!

विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन मास !
आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास !४!

विद्यापति गीत - गौरी के वर देखि बड़ दुःख भेल

गौरी के वर देखि बड़ दुःख भेल, सखी बड़ दुःख भेल...

मन के मनोरथ मने रहि गेल, लैलो भिखारी पर सेहो बकलेल !
भोला के कतहुं जगत नाहीं साँक लेल, बरके जे देखि गायनि धुरि गेल!!

हमर गौरी नहिं छथि बकलेल, तिनका एहन बर कोना आनि गेल !
भनहिं विद्यापति बड़ दिन भेल, गौरी मंगन शिव आनन्द भेल !!

विद्यापति गीत - चन्दा जनि उग आजुक राति

चन्दा जनि उग आजुक राति !
पिया के लिखिअ पठाओब पांति !१!

साओन सएँ हम करब पिरीति !
जत अभिमत अभि सारक रिति !२!

अथवा राहु बुझाओब हंसी !
पिबि जनु उगिलह सीतल ससी !३!

कोटि रतन जलधर तोहें लेह !
आजुक रमनि धन तम कय देह !४!

भनइ विद्यापति सुभ अभिसार !
भल जल करथइ परक उपकार !५!

विद्यापति गीत - चानन भेल विषम सर रे

चानन भेल विषम सर रे, भुषन भेल भारी !
सपनहुँ नहि हरि आयल रे, गोकुल गिरधारी !१!

एकसरि ठाठि कदम-तर रे, पछ हरेधि मुरारी !
हरि बिनु हृदय दगध भेल रे, झामर भेल सारी !२!

जाह जाह तोहें उधब हे, तोहें मधुपुर जाहे !
चन्द्र बदनि नहि जीउति रे, बध लागत काह !३!

कवि विद्यापति गाओल रे, सुनु गुनमति नारी !
आजु आओत हरि गोकुल रे, पथ चलु झटकारी !४!

विद्यापति गीत - जखन लेल हरि कंचुअ अछोहि

जखन लेल हरि कंचुअ अछोहि !
कत परि जुगुति कयलि अंग मोहि !१!

तखनुक कहिनी कहल न जाय !
लाजे सुमुखि धनि रसलि लजाय !२!

कर न मिझाय दूर दीप !
लाजे न मरय नारि कठजीव !३!

अंकम कठिन सहय के पार !
कोमल हृदय उखडि गेल हार !४!

भनह विद्यापति तखनुक झन !
कओन कहय सखि होयत बिहान !५!

विद्यापति गीत - जगत विदित बैद्यनाथ

जगत विदित बैद्यनाथ, सकल गुण आगर हे !
तोहें प्रभु त्रिभुवन नाथ, दया कर सागर हे !१!

अंग भसम शिर अंग, गले बिच विषधर हे !
लोचन लाल विशाल, भाल बिच शशिधर हे !२!

जानि शरण दीनबन्धु, शरण धय रहलहूँ हे !
दया करू मम प्रतिपाल, अगम जल पड़लहूँ हे !३!

सुनाँ सदा शिव गोचर, मम एहि अवसर हे !
कौन सुनत दुःख मोर, छोड़ी तोहि दोसर हे !४!

कार नाट निज दोष, कतेक हम भोखव हे !
तोहें प्रभु त्रिभुवन नाथ, अपने कय राखब हे !५!

विद्यापति गीत - जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे

जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे, आगरि सुबुधि सेगानि !
कनकलता सनि सुनदरि सजनि में, विहि निरमाओलि आनि !१!

हस्ति-गमन जकां चलइत सजनिगे, देखइत राजकुमारि !
जनिकर एहनि सोहागिनि सजनि में, पाओल पदरथ वारि !२!

नील वसन तन घरेल सजनिगे, सिरलेल चिकुर सम्हारि !
तापर भमरा पिबय रस सजनिगे, बइसल आंखि पसारि !३!

केहरि सम कटि गुन अछि सजनि में, लोचन अम्बुज धारि !
विद्यापति कवि गाओलसजनि में, गुन पाओल अवधारि !४!

विद्यापति गीत - जोगिया मोर जगत सुखदायक

आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, दुःख ककरो नहिं देल..

दुःख ककरो नहिं देल महादेव, दुःख ककरो नहिं देल !
एही जोगिया के भाँग भुलैलक, धतुर खोआई धन लेल !१!

आगे माई, कार्तिक गणपति दुई जन बालक, जन भरी के नहिं जान !
तिनक अभरन किछओ न टिकइन, रतियक सन नहिं कान !२!

आगे माई, सोना रूपा अनका सूत अभरन, अपने रुद्रक माल !
अपना मँगलो किछ नै जुरलनी, अनका लै जंजाल !३!

आगे माई, छन में हेरथी कोटिधन बकसथी, वाहि देवा नहिं थोर !
भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि, इहो थिका दिगम्बर मोर !४!

विद्यापति गीत - जौवन रतन अछल दिन चारि

जौवन रतन अछल दिन चारि !
से देखि आदर कमल मुरारि !१!

आवे भेल झाल कुसुम रस छूछ !
बारि बिहून सर केओ नहि पूछ !२!

हमर ए विनीत कहब सखि राम !
सुपुरुष नेह अनत नहि होय !३!

जावे से धन रह अपना हाथ !
ताबे से आदर कर संग-साथ !४!

धनिकक आदर सबतह होय !
निरधन बापुर पूछ नहि कोय !५!

भनइ विद्यापति राखब सील !
जओ जग जिबिए नब ओनिधि भील !६!

विद्यापति गीत - देखु सखी दाइ माइ ठकलक बभना

देखु सखी दाइ माइ ठकलक बभना !
आइ ठकलक बभना !१!

सुनैत छलियनि जस तिन भुवना !
आव सुनै छी घर नहिं अंगना !२!

भोला के माय नहिं बाप केउ छैन अपना !
गौरीके ननदि सासु दुनू सपना !३!

गौरी तप कैलनि राति दिना !
तिनका एहन वर देल बिधना !४!

भनहिं विद्यापति सुनू हे मैना !
प्राचत सदा शिव भरि अंगना !५!

गुरुवार, 29 मई 2014

विद्यापति गीत - धुर धुर छिया रे छिया

धुर धुर छिया रे छिया !
एहन बौराहा वर संग कोना जयति धिया !१!

पञ्च मुख बिच सोभित तीन अँखिया !
सह - सह नाचै छैन साँप सखिया !२!

कांख तर झोरा सोभित धतुरा के बिया !
दिगम्बर के रूप देखि साले मयनाके हिया !३!

जौं कदापि धिया के बिष देथिन पिया !
कोह्बरे में मरती धिया के देथुन जिया !४!

भनहिं विद्यापति सुन धिया के मइया !
बैसले ठाम गौरी गुजर करइया !५!

विद्यापति गीत - नव यौवन अभिरामा

कि आरे, नव यौवन अभिरामा !
जत दखल तत कहहि न पारिअ छलो, अनुपम एक ठामा !१!

हरिन इन्दु अरविन्द करनी हेम पिक बुझल अनुमानी !
नयन बयन परिमल गति तनुरुची ओ गति सुललित बानी !२!

कुचजुग उपर चिकुर फूजी पसरल ना अरुझाएल हारा !
जनि रे सुमेरु ऊपर मिली उगल चाँद विहीन सबे तारा !३!

लोल कपोल लुलित मणि - मुंडल अधर बिम्ब अध् जाई !
भजहु भमर नासापुट सुन्दर से देखि कीर लजाई !४!

भनहिं विद्यापति से वर नागर आन न पाबए कोई !
कंस दलन नारायण सुन्दर तसु रंगीनि पए होई !५!

विद्यापति गीत - गौरा तोर अंगना

गौरा तोर अंगना !

बर अजगुत देखल तोर अंगना !
एक दिस बाघ सिंह करे हुलना !
दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना !१!
हे गौरा तोर ..............

पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना !
सम्पति मध्य देखल भांग घोटना !२!
हे गौरा तोर ...............

खेती न पथारि शिव गुजर कोना !
मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना !३!
हे गौरा तोर ...............

कार्तिक गणपति दुई चेंगना !
एक चढथि मोर एक मुसना !४!
हे गौर तोर ............

भनहि विद्यापति सुनु उगना !
दरिद्र हरण करू धइल सरना !५!

विद्यापति गीत - बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे

बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे !
छाड़इते निकट नयन बह नीरे !१!

कर जोड़ि बिनमञो विमलतरङ्गे !
पुन दरसन होअ पुनिमति गङ्गे ! २!

एक अपराध छेँओब मोर जानी !
परसल माए पाए तुअ पानी !३!

कि करब जप तप जोग धेआने !
जनम सुफल भेल एकहि सनाने !४!

भनइ विद्यापति समन्दञो तोही !
अंत काल जनु बिसरह मोही !५!

विद्यापति गीत - माधव ई नहि उचित विचार

माधव ई नहि उचित विचार !
जनिक एहनि धनि काम-कला सनि से किअ करु बेभिचार !१!

प्रनहु चाहि अधिक कय मानय हदयक हार समाने !
कोन परि जुगुति आनके ताकह की थिक तोहरे गेआने !२!

कृपिन पुरुषके केओ नहि निक कह जग भरि कर उपहासे !
निज धन अछइत नहि उपभोगब केवल परहिक आसे !३!

भनइ विद्यापति सुनु मथुरापति ई थिक अनुचित काज !
मांगि लायब बित से जदि हो नित अपन करब कोन काज !४!

विद्यापति गीत - मानिनि आब उचित नहि मान

मानिनि आब उचित नहि मान !
एखनुक रंग एहन सन लागय जागल पए पंचबान !१!

जूडि रयनि चकमक करन चांदनि एहन समय नहि आन !
एहि अवसर पिय मिलन जेहन सुख जकाहि होय से जान !२!

रभसि रभसि अलि बिलसि बिलसि कलि करय मधु पान !
अपन-अपन पहु सबहु जेमाओल भूखल तुऊ जजमान !३!

त्रिबलि तरंग सितासित संगम उरज सम्भु निरमान !
आरति पति मंगइछ परति ग्रह करु धनि सरबस दान !४!

दीप-बाति सम भिर न रहम मन दिढ करु अपन गेयान !
संचित मदन बेदन अति दारुन विद्यापति कवि भान !५!

विद्यापति गीत - लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे

लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे !
सिव-सिव जिव नहिं जाय आस अरुझायल रे !१!

मन कर तहाँ उडि जाइ जहाँ हरि पाइअ रे !
पेम-परसमनि-पानि आनि उर लाइअ रे !२

सपनहु संगम पाओल रंग बढाओलरे !
से मोर बिहि विघटाओल निन्दओ हेराओल रे !३!

सुकवि विद्यापति गओल धनि धइरज धरु रे !
अचिरे मिलत तोर बालमु पुरत मनोरथ रे !४!

विद्यापति गीत - सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ

सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ !
रोपि पेम बिज अंकुर मूड़ल बांढब कओने उपाइ !१!

तेल-बिन्दु दस पानि पसारिअ ऐरान तोर अनुराग !
सिकता जल जस छनहि सुखायल ऐसन तोर सोहाग !२!

कुल-कामिली छलौं कुलटा भय गेलौं तनिकर बचन लोभाइ !
अपेनहि करें हमें मूंड मूडाओल कान्ह सेआ पेम बढ़ाइ !३!

चोर रमनि जनि मने-मने रोइअ अम्बर बदन भपाइ !
दीपक लोभ सलभ जनि घायल से फल पाओल घाइ !४!

भनइ विद्यापति ई कलयुग रिति चिन्ता करइ न कोई !
अपन करम-दोष आपहि भोगइ जो जनमान्तर होइ !५!

विद्यापति गीत - सरसिज बिनु सर सर बिनु सरसिज

सरसिज बिनु सर सर बिनु सरसिज, की सरसिज बिनु सूरे !
जौबन बिनु तन, तन बिनु जौबन की जौक पिअ दूरे !१!

सखि हे मोर बड दैब विरोधी !
मदन बोदन बड पिया मोर बोलछड, अबहु देहे परबोधी !२!

चौदिस भमर भम कुसुम-कुसुम रम, नीरसि भाजरि पीबे !
मंद पवन बह, पिक कुहु-कुहु कह, सुनि विरहिनि कइसे जीवे !३!

सिनेह अछत जत, हमे भेल न टुटत, बड बोल जत सबथीर !
अइसन के बोल दुहु निज सिम तेजि कहु, उछल पयोनिधि नीरा !४!

भनइ विद्यापति अरे रे कमलमुखि, गुनगाहक पिय तोरा !
राजा सिवसिंह रुपानरायन, रहजे एको नहि भोरा !५!

बुधवार, 28 मई 2014

विद्यापति गीत - सासु जरातुरि भेली

सासु जरातुरि भेली, ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली !
तैसन न देखिअ कोई, रयनि जगाए सम्भासन होई !१!

एहि पुर एहे बेबहारे, काहुक केओ नहि करए पुछारे !
मोरि पिअतमकाँ कहबा, हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा !२!

पथिक, कहब मोर कन्ता, हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता !
भनइ विद्यापति गाबे, भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे !३!

विद्यापति गीत - सैसव जौवन दुहु मिलि गेल

सैसव जौवन दुहु मिलि गेल !
स्रवनक पथ दुहु लोचन लेल !१!

वचनक चातुरि लहु-लहु हास !
धरनिए चाँद कएल परगास !२!

मुकुर हाथ लए करए सिङ्गार !
सखि पूछए कैसे सुरत-बिहार !३!

निरजन उरज हेरइ कत बेरि !
बिहुसए अपन पयोधर हेरि !४!

पहिल बदरि सम पुनु नवरङ्ग !
दिने-दिने मदन अगोरल अङ्ग !५!

माधव देखल अपरुब बाला !
सैसव जौवन दुहु एक भेला !६!

विद्यापति कह तुहु अगेआनि !
दुहु एक जोग इह के कह सयानि !७!

विद्यापति गीत - हम जुवती, पति गेलाह बिदेस

हम जुवती, पति गेलाह बिदेस !
लग नहि बसए पड़उसिहु लेस !!

सासु ननन्द किछुआओ नहि जान !
आँखि रतौन्धी, सुनए न कान !१!

जागह पथिक, जाह जनु भोर !
राति अन्धार, गाम बड़ चोर !२!

सपनेहु भाओर न देअ कोटबार !
पओलेहु लोते न करए बिचार !३!

नृप इथि काहु करथि नहि साति !
पुरख महत सब हमर सजाति !४!

विद्यापति कवि एह रस गाब !
उकुतिहि भाव जनाब !५!

Bangaon Darshan (Photo Gallery)

बनगाँव प्रवेश द्वार

















बाबा लक्ष्मीनाथ मंदिर (बाबाजी कुटी)


















बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (पुरान मूर्ति) 























बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (नबका मूर्ति)





















संत खियाली खाँ बंगला (बाबाजी कुटी)

















ठाकुरजी मंदिर (बाबाजी कुटी)
























माँ भगवती आर माँ काली मंदिर (भगवती स्थान)


















































मैया भगवती @ भगवती मंदिर 


































































मैया काली @ काली मंदिर (भगवती स्थान) 

































बनगाँव के होली @ भगवती स्थान 


















विद्यापति गीत - हम नहिं आजु रहब एहि आँगन

हम नहिं आजु रहब एहि आँगन जौँ बुढ़ होएता जमाय !!

एक तो बैरी भेल बिध विधाता, दोसर धिया केर बाप !
तेसर बैरी भेल नारद ब्रह्मण, जे बुढ़ आनला जमाय !१!

धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब देवनी छिनाय !
जौँ किछु बजता नारद ब्रह्मण, दाढ़ी धय घिसीयाब !२!

अरिपन निपलन्ही पुरहर फोरलन्ही, फेकलन्ही बहुमुख दीप !
धिया लय मनाइनि मंदिर पैसली, केयो जुनि गायब गीत !३!

भनहिं विद्यापति - सुनू हे मनाइनि, इहो थिका त्रिभुवन नाथ !
शुभ शुभ कय गौरी विवाह, इहो वर लिखल ललाट !४!

विद्यापति गीत - हम नहिं गौरी शिवके बिआहब

हम नहिं गौरी शिवके बिआहब, मोरि गौरी रहति कुमारि गे माई !
भुत - प्रेत लै ऐलन बराती, मोर जिय गेल डराई गे माई !१!

गालो चुटकल मोछो पाकल, पैरो में बत्तीस बेमाय गे मई !
गौरी लए भागव गौरी लए परायब, गौरी लय जायव नइहर गे माई !२!

भनहिं विद्यापति - सुनू हे मनाइनि, इहो थिका त्रिभुवन नाथ !
कहत भिखारी दास दोऊ कर जैसी, बस बस होवे विवाह गे माई !३!

हम नहिं गौरी शिवके बिआहब, मोरि गौरी रहति कुमारि गे माई !
भुत - प्रेत लै ऐलन बराती, मोर जिय गेल डराई गे माई !४!

विद्यापति गीत - जय जय भैरवि असुर-भयाउनि

जय जय भैरवि असुर-भयाउनि
पशुपति - भामिनी माया
सहज सुमति वर दिअओं गोसाउनि
अनुगत गति तुअ पाया

वासर रैन शवासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूडा
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओं उगिलि कैल कूड़ा

सामर वरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फूल कोका
कट कट विकट ओठ फुट पाँड़रि
लिधुर फेन उठ फोका

घन घन घनन नुपुर कत बाजय
हन हन कर तुअ काता
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरि जुनी माता

Maha Kavi Vidyapati Geet - महाकवि विद्यापति गीत

















  1. जय जय भैरवि असुर-भयाउनि
  2. हम नहिं गौरी शिवके बिआहब
  3. हम नहिं आजु रहब एहि आँगन
  4. हम जुवती, पति गेलाह बिदेस
  5. सैसव जौवन दुहु मिलि गेल
  6. सासु जरातुरि भेली
  7. सरसिज बिनु सर सर बिनु सरसिज
  8. सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ
  9. लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे
  10. मानिनि आब उचित नहि मान
  11. माधव ई नहि उचित विचार
  12. बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे
  13. गौरा तोर अंगना
  14. नव यौवन अभिरामा
  15. धुर धुर छिया रे छिया
  16. देखु सखी दाइ माइ ठकलक बभना
  17. जौवन रतन अछल दिन चारि
  18. जोगिया मोर जगत सुखदायक
  19. जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे
  20. जगत विदित बैद्यनाथ
  21. जखन लेल हरि कंचुअ अछोहि
  22. चानन भेल विषम सर रे
  23. चन्दा जनि उग आजुक राति
  24. गौरी के वर देखि बड़ दुःख भेल
  25. के पतिआ लय जायत रे
  26. कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल
  27. कुंज भवन सएँ निकसलि रे
  28. कि कहब हे सखि रातुक बात
  29. कान्ह हेरल छल मन बड़ साध
  30. कंटक माझ कुसुम परगास
  31. उचित बसए मोर मनमथ चोर
  32. आहे सखि आहे सखि लय जनि जाह
  33. आसक लता लगाओल सजनी
  34. आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन
  35. अम्बर बदन झपाबह गोरि
  36. अभिनव पल्लव बइसंक देल
  37. अभिनव कोमल सुन्दर पात

मंगलवार, 27 मई 2014

Bangaon Ke Mahapurush - बनगाँव के महापुरुष

बनगाँव ऑनलाइन के एहि स्तम्भ "बनगाँव के महापुरुष" लेल महापुरुष सभक फोटो (जेना की स्वर्गीय: लखन खाँ, पंडित छेदी खाँ, ललित झा वगैरह - वगैरह) आमंत्रित अछि।  जिनका किनको लग कुनु महापुरुषक फोटो हुवे ओ हमरा हमर ईमेल: jitmohan_jha@yahoo.com पर भेजबाक कस्ट करी।

___धन्यवाद 





सोमवार, 26 मई 2014

Baba Laxminath Bhajan - बाबा लक्ष्मीनाथ भजन

गुरु वन्दना

एक ही समय में दो जगह (विशिष्ट चमत्कार)

नवान्न का दिन था। परसरमा के एक जमींदार ने सबेरे आकर बाबा जी को निमंत्रण दे दिया। पड़ोसी के नाते उन्होंने स्वीकार भी कर लिया। कुछ ही समय बाद पंचगछिया के दूसरे प्रतिषिठत जमींदार सवारी के साथ नवान्न का निमंत्रण देने पहुँचे। आप पहले जमींदार के मित्र थे। निमंत्रण का आशय पर स्वामी जी ने कहा- ''मैं तुम्हारे मित्र का निमंत्रण स्वीकार कर चुका हूँ। उसको मनाओ अगर वे मान जायें तो मुझे तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करने में कोर्इ आपत्ति नहीं। अन्यथा लाचारी है, कारण नवान्न का समय 10 बजे से 11 बजे दिन तक ही है। फिर परसरमा से पंचगछिया 7-10 मील दूरी का भोजनोपरान्त एक घंटा में तय करना आसान नहीं।

पंचगछिया वाले बाबू साहेब अपने मित्र के यहाँ पहुँचे और कहा- ''मित्रवर! मैं पहले ही बाबा को निमंत्रण देने का संकल्प कर चुका हूँ। अत: आठ-दस मील की दूरी तय कर सबेरे-सबेरे आया हूँ। लेकिन मालूम हुआ कि आप पहले ही निमंत्रण दे चुके हैं। अत: मेरा आग्रह और निवेदन है कि आप उन्हें छोड़ दें अन्यथा वे मेरा निमंत्रण स्वीकार नहीं करेंगे। आपके तो घर के आदमी हैं जब चाहेंगे खिला सकते हैं।

परसरमा वाले बाबू साहब ने उत्तर दिया- ''स्वामी जी एक तो ब्राह्राण और दूसरे महात्मा हैं। मैं निमंत्रण दे चुका हूँ, अब आपका प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता। मैं भी राजपूत हूँ, मुझसे यह अनुचित कर्म न करावें, यह मेरी प्रार्थना है।

पंचगछिया के बाबू साहेब निराश होकर स्वामी जी के पास पहुँचे और सम्मान भाव से कहा- ''बाबा वे राजी नहीं हुए। मेरे भाग्य में नहीं लिखा था कि आपके चरण से मेरा घर पवित्र हो। उनके सम्मान भाव से स्वामी जी पिघल गये और कहा- ''आप अपनी सवारी छोड़ते जाइये मैं आने की चेष्टा करूँगा। बाबू साहेब ने कहा- ''बाबा! नवान्न का समय एक ही है, कितनी भी तेज सवारी क्यों न हो पर पहुँचना सम्भव नहीं। किन्तु, श्रीमान का शुभागमन तो सर्वदा मेरे लिये कल्याण कारक है। स्वामी जी ने कहा- ''परमेश्वर की जैसी मरजी। मनुष्य को यन्त करना चाहिए। तुम आगे बढ़ो।

बाबू साहेब सिर पर पाँव रखकर दौड़े। मन में अपार हर्ष था कि कोर्इ समय हो, बाबा का चरण तो मेरे घर को पवित्र करेगा।

उनके चले जाने के बाद बाबा ने कोचवान को कहा- ''तुम भी तेजी के साथ आगे बढ़ो। रास्ते में मैं तुम को पकड़ लूँगा।

परसरमा के बाबू साहब ने स्वामी जी को साढ़े दस-पौने ग्यारह बजे होमादि के बाद भोजन कराये। भोजनोपरान्त प्रेमपूर्वक बाबा को दरवाजा पर बैठाया। बाबू साहब स्वामी जी के निकट बैठे जमात को समझाने लगे कि किस प्रकार अपने मित्र के पंजे से बाबा को छुड़ा लाये।

उधर जब घोड़ा गाड़ी पंचगछिया के समीप पहुँची तो स्वामी जी ने पीछे से आवाज दी- ''कोचवान गाड़ी खड़ी करो। कोचवान ने मुड़कर देखा तो बाबा ही थे। उसने गाड़ी खड़ी कर दी। बाबा ठीक साढ़े दस, पौने ग्यारह बजे पंचगछिया के बाबू साहेब के यहाँ उपसिथत थे। स्वामी जी के शुभागमन की खबर सुनकर बाबू साहेब को बेहद खुशी हुर्इ। स्वागत कर दरवाजा पर ले गये। पलंग पर बैठा कर स्वयं पाँव धोये। होमादि समाप्त कर श्रऋापूर्वक भोजन कराये। भोजनोपरान्त दरवाजे पर ले गया। बाबा का नाम सुनकर लोग उमड़ पड़े। बाबू साहेब लोगों को प्रात: काल के वृतांत को दुहराने लगे।

पंचगछिया के बाबू साहेब समझ रहे थे कि स्वामी जी वहाँ भोजन न कर यहीं भोजन करने आये हैं। क्योंकि ठीक दस बजे भी भोजन कर चलने से नवान्न के निशिचत समय के अन्दर नहीं आ सकते थे। सीधे यहीं आ गये हैं।

कुछ समय बाद जब पंचगछिया वाले बाबू साहेब की भेंट अपने मित्र से हुर्इ तो कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा- ''मित्र! मेरे लौटने के बाद आपने जो बाबा को छोड़ दिया कि वे नवन्न समय के अन्दर ही साढ़े दस, पौने ग्यारह बजे मेरे यहाँ पधार सके, इसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद। विसिमत होकर परसरमा वाले बाबू साहेब ने कहा- ''मित्र आपको धोका हुआ है। साढ़े दस, पौने ग्यारह बजे तो बाब मेरे यहाँ भोजनोपरान्त, दरवाजे पर बैठ कर लोगों से वार्तालाप कर रहे थे। फिर आपके यहाँ पहुँचने का प्रश्न ही नहं उठा। इस प्रकार अपने यहाँ की उपसिथति को सत्य और दूसरे के यहाँ की उपसिथत पर सन्देह व्यक्त करते हुए वार्तालाप बढ़ता गया। एक दूसरे को उपसिथति की प्रामणिकता को अधिक पुष्ट करने के लिए गवाह देते गये।

श्रीकृष्ण और मत्स्येंद्रनाथ के योग बल का जिन्हें परिचय होगा उन्हें स्वामी जी के योग द्वारा दो रूप बनाने का आश्चर्य नहीं होगा।

कोल (सूअर) द्वारा क्रानित (विशिष्ट चमत्कार)

एक समय गोस्वामी जी पर्यटन करते हुए अपने दलबल के साथ मुसलमान की एक बस्ती बखितयारपुर पहुँचे। गरमी का समय था। स्वामी जी की आज्ञा हुर्इ कि स्नान-कीर्तन यहीं होना चाहिए। नित्य कर्म से निवृत हो कीर्तन प्रारम्भ किये। ढोलक पर थाप की आवाज सुन मूसलमोनों के कान खड़े हुए। युवक मुसलमानों ने आकर रोका। परन्तु कीर्तन बन्द नहीं हुआ। उन लोगों ने अलबल बकना, धूल उड़ाना आदि उपद्रव प्रारम्भ किया। स्वामी जी कुछ देर कीर्तन को रोककर समाधिस्थ हुए।

कुछ ही क्षण बाद झुण्ड के झुण्ड कोलों (सूअरों) ने गाँव में प्रवेश कर उपद्रव मचाने लगा। घर-द्वार, भोजन सामग्री आदि नष्ट होने लगे। ज्यों-ज्यों निवारण की चेष्टा होती, त्यों-त्यों कोलों की संख्या और उपद्रव बढ़ते जाते। उपद्रवी युवकों का ध्यान गया तो वे ग्राम रक्षार्थ दौड़े। उपद्रवियों ने अपनी काली करतूत लोगों को सुनार्इ। सुनते ही कुछ वयोवृद्ध मुसलमानों ने स्वामी जी से क्षमा प्रार्थना की और कहा- ''कुछ उदण्डों ने आपके साथ जो अशिष्टता की है, उसके लिए हमलोग क्षमा प्रार्थी हैं। स्वामी जी ने कहा- ''जब तक कीर्तन पुन: प्रारम्भ नहीं होगा तब तक इस उपद्रव को कोर्इ रोक नहीं सकता। वृद्ध मुसलमानों ने नम्रतापूर्वक कहा- ''निर्विरोध आप अपना कीर्तन प्रारम्भ करें। इधर कीर्तन प्रारम्भ हुआ उधर धीरे-धीरे कोलों का उपद्रव ग्राम में समाप्त होले लगा।

इस प्रकार की क्रानित गोñ तुलसीदास ने दिल्ली बादशाह के यहाँ बन्दरों से करवायी थी।

Baba Laxminath Gosai - बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई

प्रथम देव गुरु देव जगत में, और ना दुजो देवा। 
गुरू पूजे सब देवन पूजे, गुरू सेवा सब सेवा।। 
गुरू ईष्ट गुरू मंत्र देवता, गुरू सकल उपचारा। 
गुरू मंत्र गुरू तंत्र गुरू हैं, गुरू सकल संसारा।। 
गुरू आवाहन ध्यान गुरू हैं, गुरू पंच विधि पुजा। 
गुरू पद हव्य कव्य गुरू पावक, सकल वेद गुरू दुजा।। 
गुरू होता गुरू याग महायशु, गुरू भागवत ईशा। 
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु सदाशिव, इंद्र वरुण दिग्धीशा।। 
बिनु गुरू जप तप दान व्यर्थ व्रत, तीरथ फ़ल नहिं दाता। 
"लक्ष्मीपति" नहिं सिध्द गुरू बिनु, वृथा जीव जग जाता।।

राह की मिटटी से खीर (विशिष्ट चमत्कार)

 एक बार दो पहर रात में 15-20 नागाओं का एक झुंड बनगाँव बाबा जी की कुटी पर पहुँचा। भंडारी ने उनलोगों का स्वागत किया और पूछा- ''आपलोग भोजन बनायेंगे या मैं अपने आदमी द्वारा बनवा दूँ? उन्होंने कहा- ''हमलोग खीर खाएँगे, आप अपने आदमी द्वारा बनवा दीजिये। भंडारी ने कहा- ''राम बहुत हो गर्इ है। अभी दूध मिलना कठिन है। अत: खीर अभी नहीं बन सकती।

नागाओं ने अपना हठ प्रयोग किया। इन्होंने कहा- ''तब हमलोग नहीं खायेंगे, खिलाना हो तो खीर खिलाओ। भंडारी ने स्वामी जी से सब हाल कह सुनाया। स्वामी जी ने कहा- ''रसोर्इ बनाकर खिला दो। भंडारी- ''वे खायें तब तो! वे कहते हैं कि खीर के सिवाय कुछ नहीं खा सकते। स्वामी जी- ''अच्छा! तो टोकना में पानी चढ़ा दो। जब पानी खौलने लगे तब खबर देना। सरबा के भाग्य में मिटटी ही लिखा है, तो मैं क्या कर सकता हूँ?

भंडारी ने नौकर और रसोइया को जगा कर चौका लगवा दिया। जब पानी खौलने लगा तब स्वामी जी को खबर दी गर्इ। स्वामी जी ने कहा- ''रास्ते पर का बालू छानकर उसमें डाल दो। कुछ देर के बाद उतार देना। भंडारी ने वैसा ही किया। रसोर्इया ने परीक्षा की, तो खीर अच्छी बनी थी। अतिथि को बुलाकर भोजन करवाया गया। वे लोग खाते और प्रशंसा करते, वाह! कैसी खीर बनी है। खाना खाकर सब सो गये और रात चैन से कटी।

सबेरा हुआ, सब कोर्इ बाह्रा भूमि गये। जब सब मैदान से निबट चुके और एकत्र हुए तो एक ने अपने अन्तरंग साथी से कहा- ''भार्इ मेरा पेट खराब हो गया है। पैखाने में आज बिल्कुल मिटटी ही निकली है। मित्र ने जवाब दिया- यह बीमारी आज मुझे भी हो गर्इ है। इस बात के फैलने पर सबों ने स्वीकार किया कि आज मल की जगह मिटटी ही सबों के पैखाने में उतरी है। सबों ने निष्कर्ष निकाला कि रात में खीर की जगह मिटटी ही खार्इ गर्इ है। कुटी पर पहुँच कर उनलोगों ने स्वामी जी से पूछा- ''बाबा हमलोगों के पैखाने में आज मिटटी निकली है। इसका क्या कारण?

स्वामी जी ने तीव्र स्वर में उत्तर दिया- ''तुम लोगों ने रसोर्इ बनाना अस्वीकार किया। इतनी रात को दूध कहाँ से आता? तब कुएँ के पानी और राह की मिटटी से काम लेना पड़ा। अतिथियों को भूखे कैसे रहने देते? नागाओं ने पूछा- ''बाबा, खाने में तो दूध की खीर से भी अच्छी मालूम पड़ती थी, इसीलिए हमलोग अघाकर खाये। कोर्इ खराबी तो नहीं करेगी? स्वामी जी ने कहा- ''खराबी क्या होगी? समझ जाओं, दुराग्रह का प्रायशिचत तुम लोगों को करना पड़ा। ऐसा हठ फिर नहीं करना। अगर कोर्इ गृहस्थ होता तो उसे अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए कितनी कठिनार्इयाँ झेलनी पड़ती?

योग सिद्धि एवं विशिष्ट चमत्कार

नेपाल महाराजा के कारागार में स्वामी जी

प्रथम बार जब स्वामी जी ने पशुपतिनाथ दर्शन हेतु नेपाल की यात्रा की थी तो दुर्भाग्य से या सौभाग्य से दर्शनोपरान्त बि्रटिश आक्रमण से जो भगदर मची थी उसके कारण स्वामी जी हिन्दू राज्य नेपाल तथा हिन्दू महाराजा के आचार-विचार, राज्य की जनता का रहन-सहन और संस्कृति को नहीं जान पाये थे। परन्तु इतना जरूर हुआ कि दुर्भाग्य एवं चिन्ता, योग निष्णात गुरू की प्रापित से सौभाग्य में परिणत हो गया।

दूसरी बार स्वामी जी ने दल बल के साथ पुन: नेपाल की यात्रा की। उपत्यका के प्रसिद्ध गाँव होते हुए वे कर्इ दिन बाद नेपाल की राजधानी काठमाण्डू पहुँचे। जहाँ गये लोगों ने उनका हार्दिक सत्कार किया। जहाँ जाते लोगों पर अस्वाभाविक असर छा जाता। थोड़े ही समय में सारे पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी ख्याति फैल गर्इ। स्वमी जी के आचार-विचार, निर्लोभ, सादगी तथा प्रेम से हरि कीर्तन आदि सदगुणों ने अल्प काल में ही नगर वासियों को आकर्षित कर लिया था।

एक दरबारी ने महाराजा से सुनाया कि भारत से ब्राह्राण कुल के एक साधु आये हैं जिनके साथ कुछ भजनियाँ भी हैं। महाराजा को साधु के दर्शन की उत्कण्ठा जागी। उन्होंने साधु को दरबार में उपसिथत करने की आज्ञा दी। दरबारी लोग स्वामी जी से मिले और आदर के साथ दरबार में उपसिथत किया। महाराजा ने प्रणाम कर कहा -बाबाजी अपना कुछ चमत्कार दिखार्इये।

स्वामी जी ने कहा - मैं जादूगर नहीं कि जादू दिखाऊँ।

महाराजा ने आवेश में आकर कहा - दिखलाना पड़ेगा, महाराज का आदेश है। निर्भीक स्वर में स्वामी जी ने उत्तर दिया - मैं तो जादू जानता ही नहीं, फिर क्या दिखलाऊँ ? महाराज हो तो तुम्हीं अपना करामात दिखलाओ। महाराज त्योरी चढ़ाकर बोले अच्छा तो मैं ही अपना करामात दिखलाता हूँ।

और उन्होंने सिपाही की ओर मुड़कर कहा, इसे कारागार में बन्द करो, मेरी आज्ञा के बिना छूटने न पावे। स्वामी जी थोड़ा भी नहीं घबराये। खुशी से सिपाही के साथ चल पड़े। भजनियों को इशारा करते हुए स्वामी जी ने कहा- रोते क्यों हो? जहाँ हमलोगों ने आते वक्त स्नान, भजन और भोजन किया था, वहीं ठहरना। बहुत शीघ्र ही आ रहा हूँ। यह सरबा (सम्बोधनात्मक शब्द) पागल हो गया है, पवन को चादर में बान्ध कर रखना चाहता है। भजनी चले गये। स्वामीजी कारागार में बन्द कर दिये गये एवं कारागार के इर्द-गिर्द शाही पहरा पड़ने लगा।

शाम में कारागार प्रबन्धक ने पूछा- आपको भोजन में क्या चाहिये? स्वमी जी को भोजन तो करना था नहीं, मजाक में उन्होंने कहा- हाथी का भोजन चाहिए। प्रबंधक ने भी मजाक में ही बड़गद और पीपल की कुछ टहनियाँ भेज दी। इधर भजनी लोग रात में कहीं ठहरे एवं प्रात: काल अपने अभीष्ट स्थान के लिये प्रस्थान किये। निशिचत स्थान पर पहुँचते ही उन लोगों ने स्वामी जी को पहले से आसन लगाये बैठज्ञ पाया। भजनियों के हर्ष की सीमा न रही। प्रसन्न होकर पूछा, आप कैसे छूटे और किस रास्ते से आये? रास्ते में हमलोगों ने नहीं देखा। फिर हमलोगों से पहले कैसे आये? स्वामी जी ने कहा- यह सब समझने की क्या आवश्यकता है। स्नान, भजन और भोजन करो।

सबों ने गुरू की आज्ञा का पालन किया। उधर सबेरे कारागार देखाा गया तो स्वामी जी गायब थे एवं कोठरी हाथी की लीद से भरी पड़ी थी। कारागार प्रबन्धक चकित होकर घबरा गया। महाराज को खबर दी गर्इ। कारागार में ताला लगा था। पहरेदार पहरा दे रहा था। मकान का कोर्इ अंश टूटा हुआ नहीं था। खिड़की से झाँक कर कोठरी के भीतर देखा गया तो कोठरी ल ीद से भरा हुआ था। विसिमत होकर उच्चाधिकारी ने पूछा- ''यहाँ लीद कैसे आर्इ? कारागार प्रबन्धक ने सारी कहानी दुहरा दी। उच्चाधिकारी ने सारी बातों का प्रतिवेदन महाराजा के पास दिया। प्रतिवेदन पढ़कर महाराजा की आँखें खुली। वे बहुत पछताने लगे। अमूल्य वस्तु प्राप्त कर भी उन्होंने खो दिया।

महाराजा का आदेश हुआ कि साधु को खोजो और सम्मान के साथ दरबार में हाजिर करो। घुड़सवार चल पड़े। 7-10 मील की दूरी पर भजनियों के साथ स्वामी जी भजन कर रहे थे। भजन समापित के बाद सरदार ने कहा- ''महाराज! हमारी सरकार को आपको बन्दी बनाने का बहुत खेद है। इस राज्य में साधु एवं ब्राह्राणों का बड़ा सम्मान है। आप साधु और ब्राह्राण दोनों हैं। ऐसी सिथति में आप जैसे महात्मा का अपमान इस राज्य के लिये कलंक का विषय है। मैं राजा की ओर से भेजा गया हूँ कि आपको सादर वहाँ ले जाकर इस कलंक को मिटाऊँ। इस हेतु श्रीमान की जो आज्ञा हो, मैं पालन करने के लिए तैयार हूँ।

स्वामी जी ने शान्त भाव से उत्तर दिया- ''मैं अब नहीं जाऊँगा। आपके साथ घुड़सवार हैं ही, आज्ञा दीजिये कि घसीट कर ले जाएँ और कारागार में बन्द कर दें। सरदार ने पाँव पकड़कर कहा- ''मनुष्य-मनुष्य ही है। उससे भूल होना स्वभाविक है। किन्तु एक बार भूल जब मालूम हो जाती है तो विद्वजन दुहराने की तो बात ही क्या? लाज से शव तुल्य हो जाते हैं। हमारे राजा गौ एवं ब्राह्राण के रक्षक राजपूत हैं, उनसे फिर ऐसी भूल नहीं हो सकती। यह सुनकर स्वामी जी ने कहा- अब मैं अभी नहीं लौटूँगा। साधु दो बातें नहीं बोलते। उनके उस व्यवहार से मुझे कुछ भी दु:ख नहीं है। उनसे कुछ लेना-देना भी नहीं है। अगर फिर कभी मौका मिला तो देखा जाएगा।

बहुत सम्मान के साथ प्रणाम कर सरदार घुड़सवार के साथ वापस लौट गया। महाराजा से जाकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया। हाथ में आये हीरे के खो जाने से जो व्यथा होती है, महाराजा ने वैसा ही महसूस किया। स्वमी जी दल बल के साथ स्वदेश लौट आये।

शनिवार, 24 मई 2014

एक नज़र बनगाँव, और बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई....

प्रिय मैथिल बंधूगण, हम आज आपके बिच उस गाँव – बनगाँव, जिला – सहरसा का चर्चा करना चाहते हैं। जिस गाँव में बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (बाबाजी) को विभुतिपाद” की रश्मि विकसित हुई थी।  जिसे आज भी बाबाजी का गाँव कहा जाता हैं। जहा आज भी बाबा अपने विराट कुटिया में विराजमान हैं।  
बाबाजी कुटी (बनगाँव), सहरसा जिला (मुख्यालय) से 9 की.मी पश्चिम में स्थित हैं।  बाबाजी के महिमा से सिचित इस गाँव में दिन दूना, रात चौगुना प्रगति देखा गया हैं।  एक से बढ़ के एक आईआईटी, आईएएस, आईपीएस, अधिकारी इस गाँव ने मिथिला को प्रदान किया हैं।  

दार्शनिक स्थान में जहा इस गाँव का “बाबाजी कुटी” प्रसिद्ध हैं।  वही गाँव में विराजमान एक से बढ़ के एक विराट मंदिर सब ग्राम वासियों के श्रद्धा को अपने आप में पिरोये हुवे हैं।  

बाबाजी कुटी (बनगाँव)  में बाबाजी के विराट मंदिर के साथ – साथ अनेक धर्मस्थल हैं।  जिसमे कुटी पर ठाकुरवाड़ी, श्री कृष्ण मंदिर, महादेव – पार्वती मंदिर, हनुमान मंदिर सामील हैं।  कुटी से थोरा पूरव जाने पर माँ बिष्हरा मंदिर स्थित हैं।  वहा से थोरा उत्तरदिसा में जाने पर माँ भगवती और माँ काली का विराट मंदिर हैं।  वहा से पूरवदिसा में आगे (चौक) पर माँ सरस्वती मंदिर हैं अन्य कई मंदिर इस गाँव में विराजमान हैं। आप इस  गाँव- बनगाँव को मिथिला का काशी माना जाता हैं।

बनगाँव जिला- सहरसा के औजस्क्ल (पहलवानी) युग में परिब्राजक बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई यहाँ पधारे थे।  उस समय वे सन्यास ग्रहण कर शिखा सूत्र को तिलांजली दे चुके थे।  उनका गठित स्वास्थ्य देखकर क्या युवक क्या वृद्ध सबो ने हर्ष पूर्वक उनका बनगाँव में स्वागत किया था।  

स्वागत इसलिए नही की वे महान साधू या योगी थे अपितु उन लोगों का विश्वास था कि अगर इनको अच्छी तरह से खिलाया – पिलाया गया तो एक दिन अच्छे पहलवान निकलेगे।  

बाबा बहुत जल्दी ग्रामवासियों के साथ घुल – मिल गए। बाबा  चिक्कादरबार (कब्बड्डी), खोरी, चिक्का, छूर – छुर, आदि देहाती खेलो में अच्छे खिलाड़ी समझे जाते थे।  उस समय बनगाँव में दूध – दही का बाहुल्य था।  एक धनी – मनी सज्जन ने उन्हें दूध पीने के लिए एक अच्छी दूध देने वाली गाय दे दी थी।  उस सज्जन का नाम स्वर्गीय श्री कारी खां था।  बाबा के लिए ग्रामीणों ने ठाकुरवाड़ी के प्रांगन में एक पर्ण कुटी बनवा दी थी, अधिक से अधिक समय वे बनगाँव में ही रहते थे।  इसलिए कि यहाँ के लोग बहुत सीधे – साधे और महात्माओं को बड़ी श्रद्धा की द्रिष्टि से देखते थे।  दिन भर स्वामीजी उनलोगों के साथ रहते और रात में योगाभ्यास किया करते थे।  

बनगाँव में ही उनको “विभुतिपाद” की रश्मि विकसित हुई थी।  अनुमानतः 1819 ईo से उन्होने ब्रजभाषा और मैथिली में कविता लिखना प्रारंभ किया था।  अधिकतर वे दोहा , चोंपाई और गीत लिखा करते थे।  लोग बाबा के अद्दभूद योग शक्ति का प्रभाव देख कर उन्हें योगी विशेष का अवतार समझने लगे।  बाबा के कुटिया में रोगियों और बन्ध्याओ का ताँता बंधने लगा।  लोग उनके अमोध वाणी से लाभ उठाने लगे, बाबा यथासाघ्य सबका दुःख दूर किया करते थे।  तब से आज तक बाबा सब ग्रामवासी के ह्रदय में बसे हैं। 

बाबा ने बनगाँव में अनेको चमत्कार किये जो हम अगले भाग में लिख्नेगे। 

प्रेम से कहिये "बाबा लक्ष्मीनाथ गोगई की जय"