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सोमवार, 26 मई 2014

योग सिद्धि एवं विशिष्ट चमत्कार

नेपाल महाराजा के कारागार में स्वामी जी

प्रथम बार जब स्वामी जी ने पशुपतिनाथ दर्शन हेतु नेपाल की यात्रा की थी तो दुर्भाग्य से या सौभाग्य से दर्शनोपरान्त बि्रटिश आक्रमण से जो भगदर मची थी उसके कारण स्वामी जी हिन्दू राज्य नेपाल तथा हिन्दू महाराजा के आचार-विचार, राज्य की जनता का रहन-सहन और संस्कृति को नहीं जान पाये थे। परन्तु इतना जरूर हुआ कि दुर्भाग्य एवं चिन्ता, योग निष्णात गुरू की प्रापित से सौभाग्य में परिणत हो गया।

दूसरी बार स्वामी जी ने दल बल के साथ पुन: नेपाल की यात्रा की। उपत्यका के प्रसिद्ध गाँव होते हुए वे कर्इ दिन बाद नेपाल की राजधानी काठमाण्डू पहुँचे। जहाँ गये लोगों ने उनका हार्दिक सत्कार किया। जहाँ जाते लोगों पर अस्वाभाविक असर छा जाता। थोड़े ही समय में सारे पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी ख्याति फैल गर्इ। स्वमी जी के आचार-विचार, निर्लोभ, सादगी तथा प्रेम से हरि कीर्तन आदि सदगुणों ने अल्प काल में ही नगर वासियों को आकर्षित कर लिया था।

एक दरबारी ने महाराजा से सुनाया कि भारत से ब्राह्राण कुल के एक साधु आये हैं जिनके साथ कुछ भजनियाँ भी हैं। महाराजा को साधु के दर्शन की उत्कण्ठा जागी। उन्होंने साधु को दरबार में उपसिथत करने की आज्ञा दी। दरबारी लोग स्वामी जी से मिले और आदर के साथ दरबार में उपसिथत किया। महाराजा ने प्रणाम कर कहा -बाबाजी अपना कुछ चमत्कार दिखार्इये।

स्वामी जी ने कहा - मैं जादूगर नहीं कि जादू दिखाऊँ।

महाराजा ने आवेश में आकर कहा - दिखलाना पड़ेगा, महाराज का आदेश है। निर्भीक स्वर में स्वामी जी ने उत्तर दिया - मैं तो जादू जानता ही नहीं, फिर क्या दिखलाऊँ ? महाराज हो तो तुम्हीं अपना करामात दिखलाओ। महाराज त्योरी चढ़ाकर बोले अच्छा तो मैं ही अपना करामात दिखलाता हूँ।

और उन्होंने सिपाही की ओर मुड़कर कहा, इसे कारागार में बन्द करो, मेरी आज्ञा के बिना छूटने न पावे। स्वामी जी थोड़ा भी नहीं घबराये। खुशी से सिपाही के साथ चल पड़े। भजनियों को इशारा करते हुए स्वामी जी ने कहा- रोते क्यों हो? जहाँ हमलोगों ने आते वक्त स्नान, भजन और भोजन किया था, वहीं ठहरना। बहुत शीघ्र ही आ रहा हूँ। यह सरबा (सम्बोधनात्मक शब्द) पागल हो गया है, पवन को चादर में बान्ध कर रखना चाहता है। भजनी चले गये। स्वामीजी कारागार में बन्द कर दिये गये एवं कारागार के इर्द-गिर्द शाही पहरा पड़ने लगा।

शाम में कारागार प्रबन्धक ने पूछा- आपको भोजन में क्या चाहिये? स्वमी जी को भोजन तो करना था नहीं, मजाक में उन्होंने कहा- हाथी का भोजन चाहिए। प्रबंधक ने भी मजाक में ही बड़गद और पीपल की कुछ टहनियाँ भेज दी। इधर भजनी लोग रात में कहीं ठहरे एवं प्रात: काल अपने अभीष्ट स्थान के लिये प्रस्थान किये। निशिचत स्थान पर पहुँचते ही उन लोगों ने स्वामी जी को पहले से आसन लगाये बैठज्ञ पाया। भजनियों के हर्ष की सीमा न रही। प्रसन्न होकर पूछा, आप कैसे छूटे और किस रास्ते से आये? रास्ते में हमलोगों ने नहीं देखा। फिर हमलोगों से पहले कैसे आये? स्वामी जी ने कहा- यह सब समझने की क्या आवश्यकता है। स्नान, भजन और भोजन करो।

सबों ने गुरू की आज्ञा का पालन किया। उधर सबेरे कारागार देखाा गया तो स्वामी जी गायब थे एवं कोठरी हाथी की लीद से भरी पड़ी थी। कारागार प्रबन्धक चकित होकर घबरा गया। महाराज को खबर दी गर्इ। कारागार में ताला लगा था। पहरेदार पहरा दे रहा था। मकान का कोर्इ अंश टूटा हुआ नहीं था। खिड़की से झाँक कर कोठरी के भीतर देखा गया तो कोठरी ल ीद से भरा हुआ था। विसिमत होकर उच्चाधिकारी ने पूछा- ''यहाँ लीद कैसे आर्इ? कारागार प्रबन्धक ने सारी कहानी दुहरा दी। उच्चाधिकारी ने सारी बातों का प्रतिवेदन महाराजा के पास दिया। प्रतिवेदन पढ़कर महाराजा की आँखें खुली। वे बहुत पछताने लगे। अमूल्य वस्तु प्राप्त कर भी उन्होंने खो दिया।

महाराजा का आदेश हुआ कि साधु को खोजो और सम्मान के साथ दरबार में हाजिर करो। घुड़सवार चल पड़े। 7-10 मील की दूरी पर भजनियों के साथ स्वामी जी भजन कर रहे थे। भजन समापित के बाद सरदार ने कहा- ''महाराज! हमारी सरकार को आपको बन्दी बनाने का बहुत खेद है। इस राज्य में साधु एवं ब्राह्राणों का बड़ा सम्मान है। आप साधु और ब्राह्राण दोनों हैं। ऐसी सिथति में आप जैसे महात्मा का अपमान इस राज्य के लिये कलंक का विषय है। मैं राजा की ओर से भेजा गया हूँ कि आपको सादर वहाँ ले जाकर इस कलंक को मिटाऊँ। इस हेतु श्रीमान की जो आज्ञा हो, मैं पालन करने के लिए तैयार हूँ।

स्वामी जी ने शान्त भाव से उत्तर दिया- ''मैं अब नहीं जाऊँगा। आपके साथ घुड़सवार हैं ही, आज्ञा दीजिये कि घसीट कर ले जाएँ और कारागार में बन्द कर दें। सरदार ने पाँव पकड़कर कहा- ''मनुष्य-मनुष्य ही है। उससे भूल होना स्वभाविक है। किन्तु एक बार भूल जब मालूम हो जाती है तो विद्वजन दुहराने की तो बात ही क्या? लाज से शव तुल्य हो जाते हैं। हमारे राजा गौ एवं ब्राह्राण के रक्षक राजपूत हैं, उनसे फिर ऐसी भूल नहीं हो सकती। यह सुनकर स्वामी जी ने कहा- अब मैं अभी नहीं लौटूँगा। साधु दो बातें नहीं बोलते। उनके उस व्यवहार से मुझे कुछ भी दु:ख नहीं है। उनसे कुछ लेना-देना भी नहीं है। अगर फिर कभी मौका मिला तो देखा जाएगा।

बहुत सम्मान के साथ प्रणाम कर सरदार घुड़सवार के साथ वापस लौट गया। महाराजा से जाकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया। हाथ में आये हीरे के खो जाने से जो व्यथा होती है, महाराजा ने वैसा ही महसूस किया। स्वमी जी दल बल के साथ स्वदेश लौट आये।

1 टिप्पणी:

  1. एक पुरानी कहावत है कि बन्दर क्या जाने अद्रक का स्वाद। भोगी राजा को क्या पता संत क्या होते है? और उन का सम्मान कैसे किया जाता हैं? उस मूर्ख राजा का नाम भी देना चाहिए था ।जय गुरु महाराज ।

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