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सोमवार, 9 जून 2014

खाना - हराम

अपने प्रिय शिष्य  जॉन साहेब के आग्रह पर एकबार स्वामी जी अपने दल-बल के साथ मुँगेर पहुँचे। किला के अन्दर साहेब की कोठी थी।  जॉन साहेब ने स्वामी जी का सारा प्रबन्ध अलग ही कर दिया था।

शहर में शोहरत हो गर्इ कि एक हिन्दू बाबाजी आये हुए हैं, जो सिद्ध योगी हैं। एक मुसलमान फकीर को इनकी तारीफ सुनकर बहुत र्इष्र्या हुर्इ। फकीर ने सोचा कि 'किसी तरह से बाबाज को नीचा दिखाया जाय। यह हिन्दू बाबाजी हैं, मुसलमान का छुआ खाने के लिए तैयार नहीं होंगे। तब इनमें 'समताभाव' में दोष दिखाकर आम लोगों में खिल्ली उड़ाऊँगा। बिना 'समताभाव' लाये कोर्इ 'फकीरे-आजम' नहीं कहला सकता। यह सेच विचार कर स्वामी के पास पहुँचा। सलाम बन्दगी कर फकीर ने कहा- ''काफिले के साथ आज आपको मेरे गरीबखाने पर दावत है। मैं उम्मीद करता हूँ, खुदा के बन्दे को कोर्इ उजूर नहीं होगा, फिर आपका जैस हुक्म।"

स्वामी जी कुछ क्षण मौन रहकर निमन्त्रण स्वीकार लिया। फकीर खुशी-खुशी चला गया। इधर भजनी लोग भिन-भिन उठे और कहा- ''बाबा! वह तो मुसलमान है। उसका अन्न खाने से तो हमलोग मुसलमान समझे जायेंगे। कोर्इ गाँव में पाँव तक नहीं रखने देगा।

स्वामी जी ने कहा- ''कोर्इ परवाह नहीं। पहले मैं भोजन करूँगा पीछे तुमलोग भोजन करना।" भजनियों ने कहा- ''आप तो सन्यासी हैं, इसी बहाने से बच जायेंगे। हमलोग ठहरे गृहस्थ, परिवार के ही लोग खाने नहीं देंगे।" स्वामी जी ने हँसते हुए कहा- ''तुमलोग चिन्ता मत करो। जब निमंत्रण स्वीकार कर चुका हूँ, तब तो जाना ही पड़गा। नहीं जाने से दोष होगा। कुछ तुलसीदल साथ में ले लेना। वही सब को शुद्ध कर देगा। अभी स्नान-भजन करो पीछे देखा जायेगा।"

फकीर अपने दौलतखाने पर पहुँच अपने मुरीदों को दावत की बात सुना दी। मुरीद लोग शहर में घुसे और थोड़े ही समय में काफी सामान ले आये। इस मामले में छोटे-बड़े सभी मुसलमान दिलचस्पी लेने लग क्योंकि खाने-पीने का सवाल था न?

जब खाना दुरूस्त हो गया तो फकीर खुद बुलाने आये। भजनियों के पाँव लड़खड़ाने लगे किन्तु बाबाजी का आदेश था। विवश होकर स्वामी जी के पीछे चले। इधर एक भजनी साथ में तुलसी दल रख लिया।

शहर के हिन्दू लोग यह जानकर कि एक हिन्दू साधु मुसलमान के यहाँ खाने के लिए जा रहे हैं, उबल पड़े। टीका-टिप्पणी के साथ नाक-भौं सिकोड़ने लगे। उग्र स्वभाव के कुछ नवयुवकों ने उनके पास जाकर कहा- ''बाबा! कहाँ जाते हो? मुसलमान के यहाँ खाने? क्यों हिन्दू की नाक कटा रहे हो? एक पेट नहीं खाओगे तो क्या होगा? मेरे यहाँ चलो, जो खाओगे खिला दूँगा। हम लोगों ने सुना था कि आप एक अच्छे बाबाजी हैं, फिर ऐसा क्यों?

स्वामी जी ने कहा- ''मैं सन्यासी हूँ। मेरे यहाँ जाति-पाति या वर्ग का सवाल नहीं है। जो श्रद्धा से खिला देता है, खा लेता हूँ। तुम्हारे धर्म में तो ''बसुधैव कुटुम्बकम लिखा है न? फिर इतनी संकीर्णता क्यों? यह कहकर स्वामी जी चले गये।

वे फकीर के यहाँ पहुँचे। दस्तर-खान बिछे हुए थे। तस्तरियाँ लगी हुर्इ थीं। पहले सिरा में स्वामी जी बैठे, उनके बाद क्रमश: भजनी लोग। तस्तरियों में तरह-तरह के खाने परोसे गये। परोसा खत्म हो गया तो स्वामी जी ने कहा- ''तुमने अपना खाना नहीं मंगवाया? फकीर ने जवाब दिय- ''बाबा! आपलोगों को खिलाकर मैं भी कुछ खा लूँगा। स्वामी जी ने कहा- ''हमलोगों के साथ खाना पड़ेगा। फकीर ने भीतर-भीतर खुश होकर कहा- ''मैं तो मेजबान हूँ।

स्वामी जी ने कहा- ''मेजबान और मेहमान गृहस्थों के यहाँ होता है, यह फकी की जमात है। फकीर ने बाबा को प्रसन्न करने के लिए अपना खाना मंगवा लिया आर अलग बैठ गया। स्वामी जी ने कहा- ''यह विषमता क्यों? एक ही पंकित में आकर खाओ न। फकीर बड़ी खुशी से तस्तरी उठा बाबा के पास जाकर बैठ गया। भजनी लोग क्रुद्ध हो रहे थे कि ''बाबा यह क्या कर रहे हैं? उन लोगों का विचार कुछ काम नहीं दे रहा था। किी का हाथ तस्तरी पर नहीं जा रहा था। इसलिए नहीं कि अभी तक बाबा जी का हाथ तस्तरी पर नहीं गया था, बलिक मन में एक स्वाभाविक घृणा उत्पन्न हो रही थी।

बाबा सभी के आन्तरिक भावों को जान रहे थे। उनका समाधान एक ही बार करना चाहते थे। स्वामी जी ने कहा- ''दंखो फकीर! हमलोग बिना भगवान को भोग लगाये नहीं खाते हैं। इसलिए पहले भोग लगाने दो तब खायेंगे। एक लम्बी चादर मंगवा दो जो सभी तस्तरियों को ढ़ँक सके। चादर मंगवार्इ गर्इ। स्वामी जी ने भजनियों से कहा- ''सब तस्तरियों में तुलसी दल डाल दो और चादर से ढ़ँक दो। आज्ञा का पालन किया गया। स्वामी जी दो मिनटों तक आँखें बन्द किये, तब भजनियों से बोले- ''चादर उठा लो। चादर उठा ली गर्इ। सबों की तस्तरियों में महज छोटे-छोटे सूअर के बच्चे जिनकी आँखें बन्द थीं, नजर आये। फकीर 'तौबा-तौबा कह कर आसन छोड़ अलग में जाकर खड़ा हुआ। स्वामी जी अपने आसन पर बैठे ही रहे। भजनियों को निकल भागने का मौका मिला किन्तु स्वामी जी की आज्ञा के बिना भागते कैसे? दर्शक मुसलमान चकित हो स्वमी जी के ऊपर नजर गड़ाये खडत्रे थे। बाबा, फकीर को सम्बोधित कर बोले- ''फकीर! भाग क्यों? फकीर ने जवाब दिया- ''यह तो हराम है। स्वामी जी ने पूछा- ''इसके खाने में दोष क्या है? यह भी पाँच तत्वों से बना है और गौ भी पाँच तत्वों से बना है। दोनों में चेतन शकित बराबर ही है। गौ को खाते हो और इसे क्यों नहीं खाते? फकीर ने जवब दिय- ''यह मैला खाता है इसलिए हराम है। स्वमी जी ने कहा- ''यह तो एकदम बच्चा है, अभी माँ का दूध भी नहीं देखा होगा, मैला की तो बात ही क्या? फकीर ने जवाब दिया- ''इसको कुरान शरीफ में हराम लिखा है। स्वामी जी ने हँसते हुए कहा- '' अभी तक कुरान के फेरे में पड़े हूए हो? इसी बल पर दूसरे की 'समता भाव की परीक्षा करने चला था? तब तो सुन लो हमारा हिन्दू शास्त्र भी कहता है कि 'मुसलमान का छुआ मत खाओ। तुम अपनी कुरान की बात रखो और हम अपने शास्त्र की बात छोड़ दें? क्या यही न्याय है? फकीर लजा गया और स्वामी से माफी माँगी। स्वामी जी ने भजनियों से कहा- ''तस्तरियों पर चादर डाल दो। स्वामी जी चलते बने। पीछे-पीछे आनन्द में मग्न हो भजनी लोग भी चले।

इस दावत में मुसलमानों की बड़ी दिलचस्पी थी मगर मकसद पूरा नहीं होने से बेहद गम भी था। यह समाचार बिजली की तरह, सारे शहर में फैल गया। 'बाबा जी की जय 'हिन्दू धर्म की जय आदि नारों से आकाश गुंजायमान हो गया। स्वामी जी के निवास स्थान पर इतनी भीड़ लगी कि स्वामी जी को उसी दिन पिछली रात में डेरा तोड़ देना पड़ा। वहाँ से वे बनगाँव चले आये।

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